रायवाला/हरिद्वार, 1 दिसंबर 2025 — राजाजी टाइगर रिजर्व के मोतीचूर–रायवाला खंड पर आज सुबह हावड़ा-देहरादून (हावड़ा-एक्सप्रेस/उपासना) ट्रेन की चपेट में आने से एक शिशु हाथी की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद फॉरेस्ट टीम और रेलवे अधिकारी मौके पर पहुंचे; रेल संचालन कुछ घंटों के लिए बाधित रहा। इस दर्दनाक घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं — क्या वन विभाग-रेलवे-प्रशासन की लापरवाही ने जानवरों और यात्रियों की सुरक्षा को खतरे में डाला?
यह कोई मामूली घटना नहीं: सूचना के मुताबिक हाथियों का झुंड रेलवे ट्रैक पार कर रहा था, लेकिन झुंड में अलग हुई एक शिशु हाथी ट्रेन के नीचे आ गया। स्थानीय रिपोर्टों में कहा गया है कि लोको-पायलट और सहायक के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है और दोनों को हिरासत में लिया गया है — पर सवाल यही है: क्या अकेला चालक जिम्मेदार है, या यह विगत वर्षों से जारी गलियारों और मिसमैच्ड ज़ोनिंग का परिणाम है?<!–कौन-कौन जिम्मेदार हो सकते हैं — , गहन जांच चाहिए
- रेलवे — हाई-स्पीड ट्रेनें अब कई वन्यजीव गलियारों के बीच से गुजरती हैं। स्पीड-नियमन, उचित साइन-बोर्डिंग, स्थायी अलर्ट सिस्टेम और लोको-पायलट को पहले से सूचित करने की व्यवस्था न होने पर जिम्मेदारी रेलवे पर आती है। कई बार ट्रेनें तय रफ्तार से तेज होने पर अँधेरे/धुंध में जानवरों को देख पाने से पहले ही पहुँच जाती हैं।
- वन विभाग — जो गलियारे और पारगमन-मार्ग निर्धारित करता है, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे गुजरने वाले संवेदनशील हिस्सों पर किसी तरह का समन्वय हो: समय-समय पर रूट-मैप, चौकसी टीमें, और आवश्यकता पड़ने पर अस्थायी ट्रैफिक-रोक। यदि इलाका हाथियों के संगत पारगमन का है, तो विशेष सावधानियाँ अनिवार्य है
- नीतिगत कमी — लंबी अवधि में वन-रेल सहविचरण रणनीति, कॉरिडोर संरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर (इंडरपास/ओवरपास) न होने की नीति-गत कमी सबसे बड़ा कारण है।
तत्काल कदम — प्रशासनिक आदेश से लागू कराए जाने योग्य (फौरन)
- प्रभावित रेलखंड पर तुरंत स्पीड-रिडक्शन (सिग्न-जोन) लागू करें — सुबह-साँझ और रात में 40–60 km/h (या निरीक्षणानुसार कम) — कम से कम संवेदनशील किमी में।
- पैट्रोलिंग वाज़न: वन विभाग और रेलवे की संयुक्त मोबाइल टास्क-फोर्स हर ड्यूटी पर तैनात रखें; स्थानीय ग्रामीणों/वन रक्षक को अलर्ट करने का मोबाइल नेटवर्क।
- लोको-पायलटों को सक्षम अलर्ट-सिस्टम दें (रेड-फ्लैश/रन-टाइम वाइल्डलाइफ अलार्म) ताकि जब गलियारे में हाथी नजर आए ट्रेन को समय रहते रोका जा सके।
- घटना की स्वतंत्र और पब्लिक फोरेंसिक जाँच-कमेटी गठित हो — DRM, DFO, ज़िला मजिस्ट्रेट, और स्वतंत्र वन्यजीव विशेषज्ञों की टीम; 30 दिन में रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
दीर्घकालिक समाधान — संरचनात्मक और नीतिगत
- इको-कोरिडोर (अंडरपास/ओवरब्रिज): जहाँ बार-बार जंगली जानवर ट्रैक पार करते हैं, वहाँ पर सुरंग/ओवरपास बनाने का प्रोजेक्ट अनिवार्य करें। फेंसिंग हाथियों के लिए हमेशा काम नहीं करती — इसलिए पारगमन मार्ग को संरक्षित करना ज़रूरी। (अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताता है कि बड़े स्तनधारियों के लिए अंडरपास बेहतर विकल्प हैं)।
- ट्रैक-साइड सेंसर्स और AI-कैमरा: थर्मल कैमरा, मूवमेंट-सेन्सर और AI-विज़न सिस्टम जो तत्काल कंट्रोल-रूम/ट्रेन को अलर्ट करें। कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट्स सफल रहे — इन्हें अपनाना चाहिए
- GPS-कॉलरिंग और झुंड-ट्रैकिंग: प्रमुख झुंडों पर कलर लगे-जुड़े उपकरण लगाकर उनकी मूवमेंट-मैपिंग कर रेलवे को रीयल-टाइम जानकारी दी जा सके।
- स्थायी समन्वय-मेकॅनिज्म: हर ज़िले में ‘Rail-Forest Coordination Cell’ जो रोज़ाना रिपोर्ट और रूट अलर्ट जारी करे।
- कड़ी सज़ा व अनुपालन-मेकेनिज्म: नियमों के उल्लंघन पर तेज़ और पारदर्शी कार्रवाई, साथ ही ट्रेन कंपनियों/कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए कम्प्लायंस ऑडिट।
प्रशासन के नाम आगाज़ी निर्देश
- अगर लोको-पायलट की लापरवाही पाई जाती है तो सजा के साथ-साथ रेलवे से मांगा जाए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये किन तकनीकी बदलावों को तत्काल लागू किया जाएगा।
- हरित संगठन और जनहित कार्यकर्ता भी इस मामले में आवाज़ उठाएँ — पर हिंसक या अवैध दबाव की जगह कानूनी और नीतिगत बदलाव की माँग रखें।
यह शोक और सवाल सिर्फ एक शिशु हाथी के मरने से आगे बढ़कर बताता है कि सड़क-रेल-वन के टकराव का नतीजा क्या होता है — कभी यात्रियों की जान पर संकट, कभी जंगली जीवन का विनाश। प्रशासन को केवल जांच करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए; तुरंत और ठोस कदम उठाने होंगे ताकि अगला परिवार, अगला झुंड और अगला प्रवासी-यात्री सुरक्षित रह सके। जनता के नाम इस घटना की निष्पक्ष जाँच, जनता को सूचना और ठोस सुधार की माँग — यही आज की ज़रूरत है।

