मोक्ष की भूमि पर अपमान — हरिद्वार में अस्थि विसर्जन को आए श्रद्धालुओं से मारपीट!”


“विश्व प्रसिद्ध तीर्थ नगरी हरिद्वार में आस्था के साथ आए एक परिवार से मारपीट की घटना ने भक्तों की सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।”

हरिद्वार —
गंगा, जिसे पतित पावनी, देवनदी और मुक्तिदायिनी कहा जाता है, हिंदू आस्था की वह धारा है जो स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली और भगवान शिव की जटाओं में विराजित होकर प्रवाहित हुई। इसी कारण गंगा केवल नदी नहीं बल्कि श्रद्धा और मोक्ष का माध्यम है।

हर हिंदू की अंतिम इच्छा होती है कि उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में किया जाए। सदियों से एक प्रश्न मन में उठता है—
“गंगा में विसर्जित अस्थियां जाती कहां हैं?”

धार्मिक मान्यता कहती है कि यह अस्थियाँ सीधे बैकुंठ धाम में श्री हरि के चरणों तक पहुंचती हैं और मृत आत्मा को मुक्ति मिलती है।

वैज्ञानिक शोध भी इस रहस्य को रोचक बनाते हैं। गंगा के जल में पारा (Mercury), सल्फर और विशेष जैव-अणु पाए जाते हैं जो अस्थियों में मौजूद कैल्शियम और फॉस्फोरस को घुलनशील बनाते हैं। यह प्रक्रिया जलजन्तुओं के लिए प्राकृतिक पोषण और जलशुद्धिकरण दोनों का काम करती है।
धार्मिक प्रतीकों में पारद शिव का स्वरूप और गंधक शक्ति का स्वरूप माने जाते हैं—अर्थात अंततः सभी जीव शिव-शक्ति में ही लीन होते हैं।

लेकिन इन्हीं आस्थाओं के साथ जब कोई परिवार हरिद्वार आता है और उसी पवित्र भूमि पर उत्पीड़न व मारपीट का शिकार होता है, तो प्रश्न उठता है—

क्या आस्था की नगरी में श्रद्धालुओं का सम्मान सुरक्षित है?

क्या गंगा मोक्ष दे रही है, और धरती पर लोग अपमान?

हरिद्वार में एक परिवार जब अपने दिवंगत परिजन की अस्थियों का विसर्जन करने आया, तब उनके साथ मारपीट की घटना सामने आई है। यह घटना केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि भावनाओं और धर्म की मर्यादा को ठेस पहुँचाने वाली है।

ऐसे स्थान पर जहाँ आत्माओं को शांति मिलती है, वहाँ जीवित मनुष्यों को अपमान मिलना कहीं से भी स्वीकार्य नहीं।


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