✨अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस

✨अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस
💫भौतिक उपलब्धियाँ सुख का मापदंड नहीं
🌟सच्चा आनंद वह है जो केवल स्वयं तक सीमित न रहे, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रकाशित करे
🙏🏻स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 20 मार्च। आज अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने एक दिव्य, प्रेरणादायी एवं समाधानपरक संदेश दिया कि खुशी कोई बाहरी वस्तु नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का मूल स्वभाव है। उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है “आनंदो ब्रह्मेति” अर्थात् परमात्मा ही आनंद स्वरूप है और वही आनंद प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। किन्तु अज्ञान, अविद्य, अहंकार और आसक्ति की परतें इस स्वाभाविक आनंद को ढक देती हैं।
शास्त्रों के अनुसार, जब हम स्वयं को केवल शरीर और मन तक सीमित मानते है, तब हम सुख-दुख के द्वंद्व में उलझ जाते हैं परंतु जब हम आत्मा के स्तर पर अपने अस्तित्व को पहचानते हैं, तब हम उस शाश्वत आनंद को अनुभव करते हैं, जो न परिस्थितियों पर निर्भर है, न समय पर। यही ‘सच्चिदानंद’ की अवस्था है, जिसका वर्णन वेदों और उपनिषदों में किया गया है। सनातन संस्कृति, शास्त्रों एवं ऋषि परम्परा की अमूल्य शिक्षाओं के माध्यम से जीवन में वास्तविक आनंद की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है।
ऋषि परम्परा हमें संदेश देती है कि आनंद प्राप्त करने के लिए बाहरी साधनों की नहीं, बल्कि भीतर उतरने की आवश्यकता है। योग, ध्यान और साधना इसके प्रमुख मार्ग हैं। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्” अर्थात अगर हम कर्म के फल का त्याग कर समत्व भाव से कार्य करते हैं, वही वास्तविक शांति और आनंद को प्राप्त करता है।
भौतिक उपलब्धियाँ सुख का मापदंड नहीं है, वे केवल क्षणिक संतुष्टि प्रदान करती हैं। स्थायी आनंद के लिए आवश्यक है चित्तशुद्धि, विŸा शुद्धि, विचारों की पवित्रता और साम्यभाव।
योग और ध्यान के माध्यम से मन को शांत कर, प्राणायाम के द्वारा जीवन ऊर्जा को संतुलित कर, और सेवा के द्वारा अहंकार को त्यागकर हम अपने भीतर के आनंद को प्रकट कर सकते हैं। यही सनातन संस्कृति का सार है “आत्मनः मोक्षार्थं जगद्धिताय च” अर्थात अपने आत्मकल्याण के साथ-साथ विश्व के कल्याण का मार्ग अपनाना।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि जैसे मां गंगा अविरल, निर्मल और निस्वार्थ भाव से बहती है, वैसे ही हमारे जीवन में आनंद का प्रवाह निरंतर बना रहता है, जरूरत है उस ओर ध्यान देने की। जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएं, हमें अपने मूल स्वरूप, पवित्रता और सेवा, को नहीं छोड़ना चाहिए।
वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अवसाद और अशांति का मुख्य कारण बाहरी परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भरता है। इसका समाधान सनातन ज्ञान में निहित है और इसके लिये प्रतिदिन कुछ समय मौन और ध्यान में बिताना, प्रकृति से जुड़ना, सत्संग और कृतज्ञता का भाव विकसित करना। जब हम इन साधनों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तब धीरे-धीरे अज्ञान की परतें हटने लगती हैं और भीतर का आनंद स्वतः प्रकट होने लगता है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि सच्चा आनंद वह है जो केवल स्वयं तक सीमित न रहे, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रकाशित करे। प्रेम, करुणा और सेवा के माध्यम से जब हम दूसरों के जीवन में खुशियाँ बाँटते हैं, तब हमारा स्वयं का आनंद भी कई गुना बढ़ जाता है।

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